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अगर वह विवाह करके अपने निजी गुप्त अंगों गुनाहों से बचाए रखे, तो ऐसा है जैसा कि वह गुनाहों के आधे रास्ते बंद कर दिया और धार्मिक अराजकता को बचा लिया है,
लेकिन यह लक्ष्य व मक़सद तभी प्राप्त (हासिल) होगा जब पत्नी (बीवी) नेक एवं पवित्र हो।
एक हदीस इसकी तफ़सीर करती (इस तरह समझाती) है, जो “मु’जामुल-अवसत-लित-तबरानी” “अत-तरग़ीब-वात-तरहीब” और”शुआबूल-ईमान-लिल-बाइहाक़ी” जैसी किताब में मौजूद हैं:
अर्थ: जिसे अल्लाह तआला निकाह के लिए एक नेक बीवी देता है, वह उसे उसके आधे दीन में बरकरार रहने में मदद करता है।
तो उसे दीन के बचे हुए आधे हिस्से के बारे में अल्लाह ताला से डरना चाहिए।
यानी निकाह के आलावा बाकी आमाल सही तरीके से करना चाहिए।
अस्सलामु अलैकुम।
प्यारे पाठको!
मेरा नाम मोहम्मद नजामुल हक है, मैं एक इस्लामी मदरसे का शिक्षक हूं।
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1 ने “हदीस की रोशनी में निकाह की अहमियत और फज़ीलत-Hadith ki Roshni mein Nikah ki Ahmiyat aur Fazilat” पर विचार किया